फास्ट ट्रैक अदालतें(Fast track courts)

1. जिला अदालतों के समान है जिनका निर्माण आपराधिक मामलों को त्वरित रूप से निपटाने के लिए किया गया है|

2. यह अदालतें 11 वें वित्त आयोग की सिफारिश पर स्थापित की गई हैं इनका उद्देश्य से विवादों का शीघ्र निपटारा करना है जिनमें अपराधी 5 वर्ष से अधिक समय तक अंडर ट्रायल विचार अधीन के तहत जेल में रह रहे हैं |

3.यह अदालतें उन मुकदमों को भी स्वीकार कर सकती हैं जिनमें न्याय की तुरंत आवश्यकता होती है|

4.प्रत्येक जिले में पांच फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना का प्रावधान है|

5.प्रतिवादी के मध्य एक प्रकार का समझौता है जिसमें अपराधी अपने अपराध को इस शर्त पर सुधार कर लेता है कि उसे कम सजा दी जाएगी |

6. इसका उद्देश्य अदालत और संबंधित पक्षों के मध्य समय और धन की बचत करना है|

7. यह व्यवस्था अमेरिका तथा यूरोप के कुछ देशों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही है |

8.भारत में न्यायालयों में मुकदमों का अत्यधिक हो गया था या व्यवस्था न्यायपालिका के कार्य को कम कर सकती है तथा लोगों को शीघ्र न्याय दिला सकती है |

9.इस उद्देश्य से भारत में आपराधिक विधि संशोधन अधिनियम 2000 पारित किया गया

10. यह व्यवस्था केवल उन मामलों में लागू होती है जिनमें अधिकतम 7 वर्ष का कारावास हो सकता है यह महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों में लागू नहीं होते हैं |

11.इस व्यवस्था से कहना है कि अदालत के ऊपर मुकदमों का भार कम किया जा सकता है परंतु आदर्श न्याय व्यवस्था के सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि कभी-कभी निर्दोष लोग भी सजा कम करने के उद्देश्य से आरोप अपने ऊपर ले लेते हैं|

(Fast track courts are similar to district courts )

1.which have been created for speedy disposal of criminal cases. These courts are set up on the recommendation of the 11th Finance Commission with the objective of speedy disposal of disputes in which the offender is more than 5 years old.

2. The courts can also accept cases that require immediate justice.

3. The 12-day plea is a type of settlement between defendants in which the perpetrator commits his crime on condition Corrects that he will be punished less. Its purpose is to save time and money between the court and the parties concerned.

4.This system is working successfully in some countries of America and Europe. In India, the cases of the courts were excessive or The system can reduce the work of the judiciary and bring quick justice to the people. With this objective, the Criminal Law Amendment Act 2000 was passed in India.

5. This system is applicable only in those cases which can carry a maximum imprisonment of 7 years. And Crimes against children do not apply in this system, it is said that the weight of the cases on the court can be reduced but it is against the principles of the ideal justice system because sometimes innocent people are also charged with the purpose of reducing the punishment. Take it up.)

ग्राम न्यायालय

1.अधिनियम 2008 के द्वारा 2 अक्टूबर 2009 से ग्रामीणों की स्थापना की गई है इसमें न्यायाधीश की नियुक्ति उच्च न्यायालय की सलाह के राज्यपाल द्वारा की गई जाएगी ग्राम न्यायालय का न्यायाधीश न्यायाधीश कारी कहलाएगा

ग्राम न्यायालय की विशेषताएं

1.ग्राम न्यायालय प्रत्येक पंचायत के खंड स्तर पर मध्यवर्ती स्तर पर स्थापित किए जाएंगे

2.ग्राम न्यायालय चलते-फिरते न्यायालय( मोबाइल कोड ) होंगे जो आपके गांव में जाकर मामलों की सुनवाई करेंगे

3. ग्राम न्यायालय सिविल व आपराधिक दोनों तरह के मामलों की सुनवाई का अधिकार होगा

4.ग्राम न्यायालयों का मुख्य उद्देश क्षेत्र के लोगों को उनके द्वार पर ही निशुल्क न्याय प्रदान करना है

 राष्ट्रीय मुकदमा नीति

1.राजनीति वर्ष 2010 में घोषित की गई थी जिसका उच्च न्यायालय का समय बचाने हेतु लंबित मामलों को त्वरित समाधान करना है जिसके तहत लंबित पड़े विवादों में सरकार स्वयं एक पक्ष के रूप में होगी

2. मुकदमा को निपटाने हेतु सरकार न्यायालय में जिम्मेदारी के साथ सम्मिलित को भी इस नीति में मुकदमों के निपटारे का औसत समय 15 वर्ष से घटकर 3 वर्ष करना है

 इस नीति की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

1.वैकल्पिक विवाद समाधान व्यवस्था जैसे लोग अदालत एवं सुलह समझौते इत्यादि के माध्यम से मुकदमों को निपटाने का समर्थन करती है

2. जिन मुकदमों में सरकार पक्षकार है वहां तथ्यों को प्रस्तुतीकरण करना है जिसमें तथ्यों के  अभाव में मुकदमों में देरी ना हो

3.न्यायालय में यदि सरकार कमजोर है तो उसे अपनी गलती स्वीकार करते हुए मुकदमों से हट जाना चाहिए

4.सरकार द्वारा पीड़ित का कम प्रयोग करना है

5. सरकारी वकीलों में विशेषज्ञता लाला चित्र याचिकाकर्ताओं पर शीघ्र कार्यवाही हो

 विभिन्न प्रकार के न्यायालय

1.भारत में समाज की जटिलता और आधुनिकता के साथ विवाद भी बढ़ रहे हैं जिसका समाधान परंपरागत न्यायपालिका के द्वारा संभव नहीं है ऐसे अनेक प्रकार के विवाद होते हैं जिसमें न्यायिक मामलों के अलावा प्रशासनिक  मुद्दे भी शामिल होते हैं ऐसे मामलों को हल करने के लिए आधीकारणों का गठन किया गया है

2. आधीकारणों में न्यायाधीशों की अतिरिक्त प्रशासनिक अधिकारियों को भी शामिल किया जाता है इसका मूल उद्देश्य परंपरागत न्यायपालिका पर न्याय का बोझ कम करना है

3. परंपरागत न्यायपालिका का अभिप्राय जिला न्यायालय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय है

4. आधीकारणों भी न्यायालय के समान ही होते हैं परंतु इसमें एक लिखित प्रकृति के मुकदमे आते हैं जैसे प्रशासनिक अधिकारियों में सरकारी निगमों प्रशासनिक सेवाओं से संबंधित विवादों तथा किराया औद्योगिक विवाद श्रम विभाग इत्यादि|

5.अधिकारों की व्यवस्था मूल संविधान में नहीं थी | संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोड़ा गया संविधान के भाग 14 का के अंतर्गत अनुच्छेद 330 का और 330 था में अधिकारों का प्रावधान किया गया है

आधीकारणों(Tribunal) की प्राकृतिक

 आधीकारणों  न्याय तथा अर्ध न्यायिक विवादों का समाधान करते हैं सभी न्यायालय आधीकारणों  के समान होते हैं या नहीं होते हैं अधिकारों को अधिकार प्राप्त होते हैं जो अधिकरण को प्राप्त होते हैं परंतु वालों को प्राप्त सभी अधिकार अधिकार को प्राप्त नहीं होते हैं इनमें तर्क व साक्ष्यों के आधार पर मध्यस्थ की तरह विवादों का निपटारा किया जाता है तथा इसमें विवाद दो सरकारी पक्षों के मध्य या फिर सरकारी और निजी पत्रकारों के बीच भी हो सकता है

The Village Court

1.Has been established by the Village Court Act 2008 with effect from 2 October 2009.

2.The judge will be appointed by the Governor on the advice of the High Court. The Judge of the Village Court will be called Judge Kari. But the village courts will be set up at the intermediate level.

3. Mobile courts will be mobile codes which will go to your village and hear cases. Village courts will have the right to hear both civil and criminal cases. But only to provide free justice.

4. The National Litigation Policy was announced in the year 2010, in the year 2010, to save the time of the High Court, to expedite the pending cases, under which the government will be itself as a party to the pending disputes.

5. In this policy, the government also has to reduce the average time for disposal of cases from 15 years to 3 years in this policy.

6. There are alternative dispute resolution systems like people support settling of cases through court and conciliation agreement etc.

7. Sardar Shahar is present in these cases where facts have to be presented in which lack of experience of facts does not delay the cases in the court if the government is weak If it is, then it should accept its mistake and move away from the cases.

8.The government has to use the victim less. Expert in government lawyers Lala Chitra Petitioners should be prosecuted quickly.

9. Different types of courts. Are also increasing, which is not possible by the traditional judiciary, there are many types of disputes which include pacific issues besides judicial cases, crores have been formed to resolve such cases. Additional administrative officers are also included. Its basic objective is to reduce the burden of justice on the traditional judiciary.

10. The traditional judiciary refers to the District Court High Court and The Supreme Court is the Tribunal, but it is the same as the court, but it comes with litigation of a written nature such as disputes related to administrative services of government corporations, administrative services and rent, industrial disputes, labor department, etc.

11.Rights were not in the constitution. Amendment Act 1976 is added by Article 14 of Part 330 of the Constitution and 323 more.)

 प्रशासनिक अधिकरण की संरचना

1.प्रशासनिक अधिकरण (323 क) बहुसदस्यीय निकाय है इसमें एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष होते हैं साथ ही अपने अन्य सदस्य हो सकते हैं जितने सरकार द्वारा निर्धारित किए जाएं |

2.अधिकरण(Tribunal) में एक न्याय तथा एक प्रशासनिक अधिकारी होना अनिवार्य है प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह शर्त है कि वह 2 वर्ष तक सचिव के पद पर रह चुके हैं न्यायिक अधिकारियों के लिए यह आवश्यक है कि वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यता रखता हो

3. वर्तमान समय में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव अध्यक्ष) एक अध्यक्ष , 16 उपाध्यक्ष , तथा 49 सदस्य हैं | सभी सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है| अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष की अधिकतम आयु 65 वर्ष होनी चाहिए क्योंकि अधिकतम आयु 62 वर्ष होती है

4. अधिकरण (Tribunal)के सदस्यों को कदाचार , असमर्थता के आधार पर न्यायिक परीक्षण के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है उन्हें हटाने की प्रक्रिया सांसद विधि द्वारा निर्धारित करती है

5.अनुच्छेद (323 क) के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों का निर्माण करें जिसके द्वारा संघ और राज्यों में नियुक्ति सेवकों की भर्ती और सेवा संबंधी मुद्दों को सुलझाया जा सके

6. इसके अंतर्गत संसद ने वर्ष 1985 में प्रशासनिक आधीकारणों  की स्थापना की | अधिकरण संवैधानिक निकाय है इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों में राज्य प्रशासनिक अधिकरण(State administrative tribunal) स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल और केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण(Central Administrative Tribunal) सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल का निर्माण किया गया है

7. वर्तमान समय में देश में प्रशासनिक अधिकरण है इनकी पीठ दिल्ली में है

8. निम्नलिखित कर्मचारी केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की अधिकारिता के अंतर्गत नहीं आते

  • सेना के कर्मचारी
  • लोकसभा एवं राज्यसभा सचिवालय के
  • उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के पदाधिकारी हरित न्यायाधिकरण ग्रीन

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *