राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण(Green tribunal )

1. ग्रीन चैनल (Green tribunal) का उद्देश्य पर्यावरण से जुड़ी सरकारी तथा गैर सरकारी विकास परियोजनाओं के मामलों का शीघ्र निपटारा करना है |

2.वर्ष 2010 में “राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010”  पारित किया गया जिसके तहत राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण का गठन किया गया |

3. इस न्यायाधिकरण में पर्यावरण से संबंधित वाद किसी भी व्यक्ति, संस्थाएनजीओ द्वारा दायर किया जा सकता है

हरित न्यायाधिकरण की संरचना.

  • हरित न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थित है जबकि इसकी क्षेत्रीय शाखाएं पुणे, चेन्नई ,और कोलकाता, में स्थापित हैं |
  • न्यायाधिकरण का अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का अवकाश प्राप्त न्यायाधीश होगा तथा इसके अन्य सदस्य उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश होते हैं |
  • न्यायाधिकरण  20  न्यायिक सदस्य , 20   विशेषज्ञ सदस्य हो सकते हैं परंतु वर्तमान में इसके 10 सदस्य पर्यावरण विशेषज्ञ तथा 10 न्यायिक सदस्य भी हैं |
  • अध्यक्ष का कार्यकाल 70 वर्ष की आयु तक तथा अन्य सदस्यों का कार्यकाल 67 वर्ष की आयु तक होता है विशेषज्ञ सदस्य विज्ञान , अभियांत्रिकी तथा तकनीकी विषयों से संबंधित विषय में स्नातक तथा पर्यावरण विषय में 5 वर्ष का व्यावहारिक अनुभव रखने वाले होते हैं विशेषज्ञों सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है |

 अपील

  • न्यायाधिकरण के समक्ष आने वाले मामलों को 6 महीने की अवधि में हर हाल कर लिया जाए और उच्चतम न्यायालय के द्वारा निर्णय देने के 90 दिन की अवधि में अपील की जा सकती है |
  • न्यायाधिकरण के द्वारा यह निर्णय लिया गया कि दिल्ली में 10 वर्ष से पुराने वाहनों को सड़क पर चलने से प्रतिबंधित कर दिया जाए इस निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की गई और उच्चतम न्यायालय ने इस निर्णय को वैधानिक माना |

न्यायाधिकरण की शक्तियां

 न्यायाधिकरण को सिविल न्यायालय की शक्तियां प्राप्त है इसके द्वारा पर्यावरणीय मुद्दे और उससे संबंधित नियमों के क्रियान्वयन से जुड़े हुए मुद्दे की सुनवाई की जाती है

 पर्यावरण से संबंधित अधिनियम

  • जल संरक्षण प्रदूषण अधिनियम 1974
  • वन संरक्षण अधिनियम 1980
  • नियंत्रण और प्रदूषण अधिनियम 1981
  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986
  • सार्वजनिक उत्तर दायित्व बीमा अधिनियम 1991
  • विविधता अधिनियम 2002
  • वन संरक्षण अधिनियम अधिनियम 1927 से जुड़े हुए अधिकरण के समक्ष नहीं लाए जा सकते

सेना न्यायालय(Army court)

  • अनुच्छेद 312 (2) and अनुच्छेद 227  के अंतर्गत थल सेना अधिनियम 1950 , वायु सेना अधिनियम 1950 , नौसेना  अधिनियम 1957  के अंतर्गत आने वाले अपराधों पर सुनवाई से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को प्रतिबंधित किया गया है
  • इसी तरह भारतीय दंड संहिता अथवा दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान भी रक्षा कर्मियों द्वारा किए गए अपराधों पर लागू नहीं होते हैं
  • उपयुक्त अधिनियम के अंतर्गत किए गए अपराधों के लिए सैन्य कर्मियों पर सुनवाई का अधिकार केवल सैन्य न्यायालयों को ही है
  • सेना में कार्यरत कोई सैन्य कर्मी  स्थानीय पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिया जाता है तो उसे पुलिस और अधिकारियों को सौंप देना चाहिए जिससे दोषी  सैन्य कर्मी की सुनवाई न्यायालय में की जा सके
  • सेना न्यायालय के द्वारा केवल सैनिकों के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाता है
  • देश में सैन्य न्यायालय एकमात्र ऐसी न्यायालय है जहां सैनिकों द्वारा किए गए अपराधों की सुनवाई होती है और उन्हें सजा भी दी जाती है
  • सैन्य न्यायालय द्वारा दी गई सजा के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है
  • सैन्य न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय संवैधानिक उपचार के अधिकार के अंतर्गत  याचिका प्रदान करता है कि न्यायालय में याचिका अनुच्छेद 226 के अंतर्गत जारी करता है
  • सैनिक न्यायालय
  • सामान्य सेना न्यायालय
  • जिला सेना न्यायालय
  • संक्षिप्त सेना न्यायालय

सामान्य सेना न्यायालय

  1. यह सेना न्यायालयों में सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्थल सेना अध्यक्ष के लिखित अनुरोध पर केंद्र सरकार द्वारा गठित किया जाता है जिसमें कम से कम 5 सैन्य अधिकारी होते हैं
  2. यह न्यायालय थल सेना अधिनियम 1950 वायु सेना अधिनियम 1950 एवं नौसेना अधिनियम 1957 के अंतर्गत दोषी किसी सैन्य कर्मियों की धनिया अपराध की सुनवाई कर सकता है
  3. यह सैन्य  न्यायालय अपनी ही कमान अर्थात थल सेना वायु सेना जल सेना के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा किए गए अपराधों की सुनवाई के लिए गठित किए जाते हैं

जिला सेना न्यायालय

  • यह न्यायालय सैन्य अधिकारी के नेतृत्व में गठित किया जाता है जो सामान्य सेना न्यायालयों  में सम्मिलित होने की योग्यता रखता है
  • सैन्य अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय अपराध के लिए किसी  सेना अधिकारी अथवा( J C O)  के विरुद्ध न्यायालय में सुनवाई की जा सकती है
  • यह  न्यायालय मृत्युदंड आजीवन कारावास अथवा 2 वर्ष से अधिक के कारावास को छोड़कर अन्य अधिनियम (थल सेना अधिनियम 1950 वायु सेना अधिनियम 1957 )के अंतर्गत अधिकृत कोई भी दंड दंड दोषी सैन्य अधिकारी को दे सकता है

 संक्षिप्त सामान्य सेना न्यायालय

  • यह  सेना न्यायालय केंद्र के सरकार के निर्देशानुसार अथवा आदेश से गठित किया जाता है जो सरकार द्वारा अधिकृत सेनाअध्यक्ष अथवा सैन्य अधिकारी के नेतृत्व में कम से कम तीन सैन्य  अधिकारियों से मिलकर बनता है |
  • इस न्यायालय की शक्तियां भी सामान्य सेना न्यायालय के समान  होती हैं यह सेना न्यायालय सैन्य अधिनियम में उल्लेखित कोई भी दंड दोषी अधिकारियों को देने में सक्षम है|

संक्षिप्त सेना न्यायालय

  • यह  न्यायालय सेना के किसी महत्वपूर्ण विभाग अथवा नियमित सेना की टुकड़ी के अधिकारी की अध्यक्षता में गठित किया जाता है जिस टुकड़ी अथवा विभाग से दोषी सैन्य अधिकारी संचित संबंधित होता है |
  • यह न्यायालय भी तीन सदस्य होते हैं जिसमें अध्यक्षता करने वाले सैन्य अधिकारी के अतिरिक्त अन्य सदस्य होते हैं यह सदस्य अधिकारी स्तर के अथवा जी. सी. यू (जूनियर कमीशन ऑफिसर) दोनों स्तरों का सदस्य होता है
  • यह न्यायालय मृत्युदंड आजीवन कारावास अथवा 1  वर्ष से अधिक के कारावास की सजा को छोड़कर सैन्य अधिनियम में उल्लेखित कोई भी दंड दे सकता है |

 जिन सदस्यों से मिलकर न्यायालय का गठन किया जाता है उनकी योग्यता का वर्णन  अधिनियम थल सेना अधिनियम 1950 वायु सेना अधिनियम 1950 एवं नौसेना अधिनियम 1957 में किया गया है

 न्यायाधीश महाधिवक्ता

  1. सैन्य अधिनियम के अंतर्गत प्रावधान है कि प्रत्येक सैन्य न्यायालय में न्यायाधीश महाधिवक्ता के विभाग का एक सदस्य न्यायाधीश अधिवक्ता उपस्थित हो रहेगा
  2. यदि कोई अधिकारी न्यायालय में सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं है तो न्यायाधीश अधिवक्ता अथवा उसके अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा अनुमोदित कोई अन्य अधिकारी न्यायालय में सुनवाई के दौरान उपस्थित रहेगा
  3. न्यायाधीश महाधिवक्ता की भूमिका सलाहकार की होती है

 न्यायाधीश महाधिवक्ता के कार्य

  • पीड़ित और आरोपी अभियुक्त दोनों को हर समय न्यायालय की सुनवाई से जुड़ी हुई कानूनी जानकारी पर सलाह देना अथवा किसी भी के प्रश्न पर दोनों की राय जानना
  • न्यायालय की कार्यवाही में अगर कोई तृतीय अथवा अनियमितता है तो न्यायालय को उससे अवगत कराना
  • न्यायालय में सुनवाई (विचारण) के दौरान उठने वाली विधि, व्यवहार अथवा प्रक्रिया पर न्यायालय द्वारा पूछे जाने पर अपनी राय देना |
  • सुनवाई की तारीख तथा स्थान के विषय में दोनों पक्षों के गवाहों को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए समन नोटिस भेजना
  • सेना न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही न्यायाधीश महाधिवक्ता का उत्तर दायित्व है कि पीड़ित और दोषी न्याय मिले
  • न्यायाधीश महाधिवक्ता का कर्तव्य दोनों पक्षों के प्रति पूर्ण निष्पक्षता का व्यवहार करें

लोक अदालतें

  • भारत में न्यायपालिका के समक्ष बड़ी संख्या में मामले लंबित है तथा न्याय की प्रणाली अत्यधिक औपचारिक व खर्चीली है
  • आम लोगों को त्वरित रूप से उपलब्ध कराने के लिए पहली बार गुजरात में वर्ष 1982 में लोक अदालतों की स्थापना की गई
  • इसके बाद विधिक सेवा अधिकरण नियम 1987  के संसदीय अधिनियम के द्वारा लोक अदालतों की स्थापना की गई
  • अदालतों का उद्देश्य आपसी बातचीत के माध्यम से विवादों का निपटारा करना है
  • यदि दोनों पक्ष सहमत हैं तो अदालतों में चल रहे मुकदमे अदालत में स्थानांतरित करके आपस में समझौते का प्रयास किया जाता है
  • इन अदालतों में कोई शुल्क नहीं लगता है समझौते की स्थिति में दोनों पक्षों के शुल्क वापस कर दिए जाते हैं लोक अदालतों का गठन उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय और जिला न्यायालय द्वारा किया जाता |

हरित न्यायाधिकरण की संरचना.

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